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सूक्त ५४

8 मन्त्रों वाला सम्पूर्ण ऋग्वेद सूक्त: संस्कृत पाठ, IAST लिप्यन्तरण और उपलब्ध स्रोत-संगत ऐतिहासिक अंग्रेज़ी अनुवाद।

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सूक्त ५४

8 मन्त्रों वाला सम्पूर्ण ऋग्वेद सूक्त: संस्कृत पाठ, IAST लिप्यन्तरण और उपलब्ध स्रोत-संगत ऐतिहासिक अंग्रेज़ी अनुवाद।

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Rigveda 8.54.1

Rigveda 8.54.1
मूल पाठ

एतत्त इन्द्र वीर्यं गीर्भिर्गृणन्ति कारवः। ते स्तोभन्त ऊर्जमावन्घृतश्चुतं पौरासो नक्षन्धीतिभिः॥

लिप्यन्तरण

etatta indra vīryaṁ gīrbhirgṛṇanti kāravaḥ | te stobhanta ūrjamāvanghṛtaścutaṁ paurāso nakṣandhītibhiḥ ||

Rigveda 8.54.2

Rigveda 8.54.2
मूल पाठ

नक्षन्त इन्द्रमवसे सुकृत्यया येषां सुतेषु मन्दसे। यथा संवर्ते अमदो यथा कृश एवास्मे इन्द्र मत्स्व॥

लिप्यन्तरण

nakṣanta indramavase sukṛtyayā yeṣāṁ suteṣu mandase | yathā saṁvarte amado yathā kṛśa evāsme indra matsva ||

Rigveda 8.54.3

Rigveda 8.54.3
मूल पाठ

आ नो विश्वे सजोषसो देवासो गन्तनोप नः। वसवो रुद्रा अवसे न आ गमञ्छृण्वन्तु मरुतो हवम्॥

लिप्यन्तरण

ā no viśve sajoṣaso devāso gantanopa naḥ | vasavo rudrā avase na ā gamañchṛṇvantu maruto havam ||

Rigveda 8.54.4

Rigveda 8.54.4
मूल पाठ

पूषा विष्णुर्हवनं मे सरस्वत्यवन्तु सप्त सिन्धवः। आपो वातः पर्वतासो वनस्पतिः शृणोतु पृथिवी हवम्॥

लिप्यन्तरण

pūṣā viṣṇurhavanaṁ me sarasvatyavantu sapta sindhavaḥ | āpo vātaḥ parvatāso vanaspatiḥ śṛṇotu pṛthivī havam ||

Rigveda 8.54.5

Rigveda 8.54.5
मूल पाठ

यदिन्द्र राधो अस्ति ते माघोनं मघवत्तम। तेन नो बोधि सधमाद्यो वृधे भगो दानाय वृत्रहन्॥

लिप्यन्तरण

yadindra rādho asti te māghonaṁ maghavattama | tena no bodhi sadhamādyo vṛdhe bhago dānāya vṛtrahan ||

Rigveda 8.54.6

Rigveda 8.54.6
मूल पाठ

आजिपते नृपते त्वमिद्धि नो वाज आ वक्षि सुक्रतो। वीती होत्राभिरुत देववीतिभिः ससवांसो वि शृण्विरे॥

लिप्यन्तरण

ājipate nṛpate tvamiddhi no vāja ā vakṣi sukrato | vītī hotrābhiruta devavītibhiḥ sasavāṁso vi śṛṇvire ||

Rigveda 8.54.7

Rigveda 8.54.7
मूल पाठ

सन्ति ह्यर्य आशिष इन्द्र आयुर्जनानाम्। अस्मान्नक्षस्व मघवन्नुपावसे धुक्षस्व पिप्युषीमिषम्॥

लिप्यन्तरण

santi hyarya āśiṣa indra āyurjanānām | asmānnakṣasva maghavannupāvase dhukṣasva pipyuṣīmiṣam ||

Rigveda 8.54.8

Rigveda 8.54.8
मूल पाठ

वयं त इन्द्र स्तोमेभिर्विधेम त्वमस्माकं शतक्रतो। महि स्थूरं शशयं राधो अह्रयं प्रस्कण्वाय नि तोशय॥

लिप्यन्तरण

vayaṁ ta indra stomebhirvidhema tvamasmākaṁ śatakrato | mahi sthūraṁ śaśayaṁ rādho ahrayaṁ praskaṇvāya ni tośaya ||

स्रोत और सम्पादकीय विवरण

  1. Rigveda Mandala 8, machine-readable Sanskrit and Roman textMandala 8Sanskrit Documents
  2. Rigveda Shakala Samhita, Mandala 8, Sukta 54RV 8.54Vedic Heritage Portal, Ministry of Culture, Government of India
एक स्पष्ट उत्तर

सामान्य प्रश्न

सूक्त ५४ क्या है?

सूक्त ५४ सनातन धर्म ज्ञान-मानचित्र का एक बिन्दु है। यह पृष्ठ इसे उसके शास्त्रीय, दार्शनिक या जीवंत परम्परा के सन्दर्भ में रखता है और इसकी शाखाओं, स्रोतों तथा सम्बन्धित मार्गों से जोड़ता है।